Sunday, 31 May 2020

किन शब्दों में कहूं मां कि तुम मेरे लिए क्या हो?

किन शब्दों में कहूं मां कि तुम मेरे लिए क्या हो?


*-सौ. भक्ति सौरभ खानवलकर*
कोलंबिया साउथ कैरोलिना यू एस ए

यूं तो मां शब्द कहने को बहुत छोटा है लेकिन इसकी व्याख्या करने जाए तो पूरा शब्दकोश ही खाली हो जाए। मां और बेटी के रिश्ते को दर्शाती मेरी एक छोटी सी कोशिश- 

किन शब्दों में कहूं मां कि तुम मेरे लिए क्या हो?
मां तुम मेरा विश्वास और हर एक श्वास हो।
मां शब्द को व्यक्त करें शब्दकोश में भी नहीं हैं इतने शब्द
फिर भी….
यह सोचा कि समेटकर स्मृतियों के सारे ताने-बाने,
लिखूं एक कविता मां तुम्हें उपहार देने।

तुम्हारी साड़ी के पल्लू का वह कोना
जिसे पकड़ कर मैं बड़ी हुई।
याद है वह धुंधला सा बचपन,
जब मां तुम ही सब कुछ थी और दूजा न कोई।
संसार की प्रत्येक वस्तु से
तुम ही ने तो थी पहचान कराई।

याद है मुझे तुम्हारी वह साड़ी,
जिसे पहनकर में इठलाती थी,
तुम जैसा साज-श्रृंगार कर,
मैं सारे घर में नाचती थी।
आज भी याद है हर एक बात,
जो तुम सिखलाती थी।

मां तुम ही प्रथम गुरु हो,
तुम्हारे ही आंचल में संसार का सारा सुख है समाया।
मां तुम ही तपती अग्नि,
और तुम ही हो शीतल छाया।
तुम्हारी ममता के साथ,
तुम्हारे रूप में मैंने एक सखी को भी पाया।

इन अनगिनत बातों का कहां है कोई अंत
बस फिर से इतना ही कहना चाहूंगी कि…
किन शब्दों में कहूं की मां तुम मेरे लिए क्या हो??

मां तुम मेरा विश्वास और हर एक श्वास हो।

ज़िंदगी की दौड़ती गाड़ी में एक ब्रेक ज़रूरी था

ज़िंदगी की दौड़ती गाड़ी में एक ब्रेक ज़रूरी था



-सौ. भक्ति सौरभ खानवलकर
-कोलंबिया, साउथ कैरोलिना, यू. एस. ए.

ऐ इंसान इतनी दौड़ भाग न कर तू,
तनिक रुक थोड़ा-सा विश्राम कर तू,
दिनभर दौड़ता है दो वक्त की रोटी कमाने के लिए,
तेरे पास तो वक्त भी नहीं अपनों के साथ बैठकर खाने के लिए,
इस दौड़ भाग को ज़रा रुकना ज़रूरी था,
इसीलिए...
ज़िंदगी की दौड़ती गाड़ी में एक ब्रेक ज़रूरी था।

थोड़ा वक्त निकाल परिवार के साथ बैठ, हंस-बोल तू,
बीवी की शिकायत दूर कर थोड़ी बच्चों की ज़िद पूरी कर तू,
हां पता है तेरे पास वक्त नहीं है बड़ा व्यस्त है तू,
पर कुछ पल शांति के मां-बाप के पास बैठ गुज़ार तू,
थोड़ी देर से ही सही पर परिवार के लिए वक्त निकालना ज़रूरी था,
इसलिए…..
ज़िंदगी की दौड़ती गाड़ी में एक ब्रेक ज़रूरी था।

स्वच्छता के साथ रहना और शुद्ध हवा में श्वास लेना भूल-सा गया था तू,
जंक फूड और कोल्ड ड्रिंक पर ही मानो जी रहा था तू,
देख प्रकृति कितनी खुश है अभी कुछ वक्त और दौड़ती ज़िंदगी पर ब्रेक लगा कर रख तू,
न जाने क्यों अपनी ज़रूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर रहता था तू,
तेरी खुद से पहचान कर तुझे आत्मनिर्भर बनाना था,
इसीलिए…..
जिंदगी की दौड़ती गाड़ी में एक ब्रेक ज़रूरी था।

आधुनिक विकास की दौड़ में खुद को संसार का मालिक समझ रहा था तू,
देख प्रकृति ने भी दिखा दिया मालिक नहीं इस संसार का सिर्फ मेहमान है तू,
जो बोओगे वही काटोगे का परिणाम आज देख रहा है तू,
अभी वक्त है संभल जा नहीं तो अपने ही मुंह की खाएगा तू,
प्रकृति को तुझे तेरी सही राह दिखाना ज़रूरी था,
इसीलिए…
ज़िंदगी की दौड़ती गाड़ी में एक ब्रेक ज़रूरी था।

Tuesday, 7 April 2020

Yeh Undino ki Baat hai | Hindi


यह उन दिनों की बात है…..



-सौ. भक्ति सौरभ खानवलकर
-कोलंबिया, साउथ कैरोलिना, यू. एस. .

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हर अंधेरे के बाद रोशनी होती है,
हर रात के बाद नई सुबह होती है,
न हारना तू हौसला अपना,
क्योंकि हर कल के साथ
एक नई उम्मीद होती है।

           दोस्तों! बीते कुछ 15-20 दिनों से मानो ऐसा लग रहा है कि किसी ने जादू की छड़ी घुमाई और हम हमारे जिंदगी के 25-30 साल पीछे चले गए। हालांकि, मैं उस ज़माने की बात कर रही हूं जब मेरा जन्म भी नहीं हुआ था। पर माता-पिता, दादा-दादी और घर के बुजुर्गों से उन दिनों की बातें ज़रूर सुनी हैं। उनके द्वारा उन पुराने दिनों की बताई हुई बातों को यदि हम आज की परिस्थितियों के साथ जोड़ कर देखें तो वाकई यही लगेगा कि हम फिर से उन पुराने दिनों में पहुंच गए हैं। हम जो टीवी पर रियालिटी शो और डेली सोप्स देखते हैं। जिनका कोई ओर-छोर नहीं होता, बस इंटरटेनमेंट के लिए या यूं कहें तो टाइम पास के लिए देखते हैं। और इनमें से कुछ शो तो परिवार के साथ बैठकर देखने लायक भी नहीं होते। पर अब इन सब की जगह उन दिनों के दौर में चलने वाले सुप्रसिद्ध रामायण और महाभारत जैसे अन्य ऐतिहासिक, पौराणिक और शिक्षाप्रद धारावाहिक को ने ले ली है। जिसे आज हम सपरिवार एक साथ बैठकर देखते हैं और आनंद लेते हैं। Domino's, McDonald's, Subway, Pizza hut, Chinese food और zomato, Uber जैसे ऐप, जो उस वक्त थे ही नहीं, की जगह सुबह-शाम घर के पौष्टिक व ताज़े खाने ने ले ली है। कोल्ड ड्रिंक आदि प्रिजर्वेटिव ड्रिंक्स की जगह हेल्दी हल्दी के दूध ने ले ली है।
        वीडियो गेम्स और मोबाइल गेम्स की जगह परिवार के साथ बैठकर खेलने वाले इंडोर गेम्स जैसे कैरम, चेस, अंताक्षरी, सांप सीढ़ी आदि गेम्स ने ले ली है। याद है दोस्तों, जिन्हें हमने हमारे बचपन में गर्मी की छुट्टियों में खेला करते थे? तो क्यों ना इन खेलों के साथ हमारी बचपन की कुछ यादें व कुछ सुनहरे पल हम आज दोबारा जी लें। आज घर में ही हम ने कुछ वक्त निकालकर अपनों से बात करना शुरू किया है। मोबाइल की दुनिया से बाहर निकलकर हम हमारे परिवार, माता-पिता, बच्चों और भाई-बहनों के साथ बैठकर गप्पे मार रहे हैं। पुरानी कुछ खट्टी-मीठी यादें ताज़ा कर रहे हैं। अपने परिवार के साथ बिताए हुए यह अनमोल पल शायद फिर कभी लौट कर नहीं आएंगे। इस भागदौड़ भरी जिंदगी में इंसान दो वक्त की रोटी कमाने के लिए दौड़ता रहता है पर वह एक वक्त भी अपने परिवार के साथ बैठकर उसका आनंद नहीं ले पाता। बस यही वो पल है जब हम सुबह-शाम परिवार के साथ बैठकर खाना खाने का आनंद ले रहे हैं। एक बात पर ज़रा गौर फरमाइए दोस्तों! अभी कुछ खाली पल में आप वक्त निकालकर याद से अपने रिश्तेदार व आपके करीबी लोगों से संपर्क कर उनके हालचाल पूछ रहे हैं। अपने बचपन के और पुराने दोस्तों के साथ फोन पर गपशप मार रहे हैं। आप वही काम कर रहे हैं जो आप टाइम नहीं है या बहुत बिज़ी हूं कहकर अक्सर डाल दिया करते थे।
          यह उन दिनों की बात है। जिस वक्त घर पर काम करने के लिए मेड ‌नहीं आती थी। आज भी वही स्थिति है घर के सभी लोग मिलकर घर के काम कर रहे हैं। घर की साफ-सफाई कर रहे हैं। उन दिनों कोई भी व्यक्ति यदि बाहर से घर आता था तो आकर नहाता था या मुंह-हाथ धोता था। आज की परिस्थिति में भी उस वक्त की यह पद्धत को हम फिर से अपना रहे हैं। मॉडर्न जमाने में हैंड शेक करने वाले लोग भी नमस्ते अपना रहे हैं। यह हमारे संस्कार है दोस्तों! हम जैसे कुछ लोग मॉडर्न बनने की होड़ में इन संस्कारों को भूल रहे हैं। पर याद रखिए, हमारे सर्वश्रेष्ठ भारतीय संस्कार आज पूरा विश्व अपना रहा है और आगे भी इसी तरह अपनाता रहेगा। जिम आदि फिटनेस ट्रेनिंग सेंटर की जगह घर में योगा और मेडिटेशन ने ले ली है। जो उन दिनों हर घर में बच्चों से लेकर वृद्ध तक हर व्यक्ति अपने आरोग्य को स्वस्थ रखने के लिए किया करते थे। आज इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए मेडिसिन सप्लीमेंट्स की जगह आयुर्वेद औषधियों और घरेलू काढे ने ले ली है। हर घर में सुबह-शाम भगवान की पूजा होने लगी है और इस कठिन परिस्थिति से जल्द बाहर निकलने के लिए प्रार्थना होने लगी है, जो उन पुराने दिनों में हर घर में हर रोज़ हुआ करती थी। सभी के घर में होने के कारण सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों की संख्या लगभग ना के बराबर हो गई है। जिसके असर से हवा शुद्ध हो रही है। हर प्रकार का प्रदूषण कम हो रहा है। पशु-पक्षी खुले व स्वच्छ वातावरण में खुश है। दौड़-भाग भरी जिंदगी थोड़ी शांत हो गई है। माता-पिता और बच्चे जिन्हें हम अपने बिजी शेड्यूल के कारण वक्त नहीं दे पाते थे उन्हें वक्त दे पा रहे हैं। और उनके साथ व्यतीत हो रहे हर पल में सुख का अनुभव भी कर रहे हैं।
         इस बात पर कभी गौर किया है दोस्तो, इस वक्त ने हमें यह एहसास करा दिया कि हमारी जरूरतें सीमित ही हैं। यदि हमारे पास अभी कोई चीज़ नहीं है तो उसे लेने के लिए हम तुरंत दौड़ नहीं रहे हैं। उसके बिना भी हमारा काम चल रहा है। जो वस्तुएं हमारे पास है उन्हीं का उपयोग करते हुए आज हम खुशी से जी रहे हैं। उन दिनों भी यही होता था। जो है उसी में खुश रहना उन दिनों से ही हमें सिखाया जाता रहा है। पर क्या करें वक्त की मार ही कुछ ऐसी होती है कि आज के वक्त में हर कोई लग्जरी की ओर खींचा जा रहा है। इन सब से दूर शांत माहौल में कुछ दिनों से वाकई में जीवन जीने की अनुभूति सी हो रही है। हम अपने ऑफिस के काम में इतना व्यस्त हो जाते थे की अपने खुद के लिए भी वक्त नहीं निकाल पाते थे। आज कम से कम किसी खाली वक्त में बैठकर अपने बारे में कुछ सोचते तो हैं। कुछ सपने या कुछ शौक जिन्हें व्यस्त दिनों में नहीं कर पाते थे आज वही सब करने का थोड़ा सा वक्त हमें मिल रहा है। क्या आप सब मेरी बात से सहमत हैं? इन सब बातों को एक बार ज़रूर सोचिए और इन दिनों में अपने परिवार के साथ वक्त बताइए। अपने लिए थोड़ा वक्त निकालिए। कुछ क्रिएटिव कीजिए, कुछ अच्छा पढ़िए, अच्छा सोचिए। देखिएगा जब हम सब की रूटीन की गाड़ी फिर से पटरियों पर सामान्य तरीके से दौड़ने लगेगी तब आप अपने आप में बहुत कुछ पॉजिटिव चेंज ज़रूर देखेंगे। यह समय यह सब सोचने का नहीं है कि अचानक यह सब क्या हो गया? यह सब कब ठीक होगा? पुराने रूटीन में हम कब आएंगे? अब हम घर में नहीं बैठ सकते वगैरह जैसे सारे नेगेटिव थॉट्स अपने माइंड से निकाल दीजिए। इस वक्त को जा़या मत कीजिए जितना लाभ उठा सकते हैं उतना लाभ उठाइए और एक-एक पल को पूरी तरह से एंजॉय कीजिए।
         दोस्तों, वाकई यह वक्त बहुत कठिन है। बाहर की परिस्थितियों के कारण हर कोई चिंतित है। ऐसे में यदि घर का कोई भी एक सदस्य कमजोर पड़ जाएगा तो सभी का मनोबल टूटेगा। जो हो रहा है उन परिस्थितियों पर किसी का बस नहीं है पर उसके लिए ईश्वर से प्रार्थना करिए कि जल्द ही सब ठीक हो जाए तथा आसपास जो भी घटनाएं घट रही है ईश्वर सभी को इन सब से उबरने की शक्ति प्रदान करें।

कहते हैं ना दोस्तों -
वक्त किसी का मोहताज नहीं होता,
बुरा वक्त आता है और चला भी जाता है,
यह समय का पहिया है,
किसी के रोकने से नहीं रुकता
बस आगे बढ़ता ही चला जाता है।
अपना तथा अपनों का ध्यान रखिए। स्वस्थ रहिए, घर में रहिए और सुरक्षित रहिए।

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Thursday, 5 March 2020

एक लोटा दूध | Hindi

एक लोटा दूध

-सौ. भक्ति सौरभ खानवलकर
-कोलंबिया, साउथ कैरोलिना, यू. एस. .



            बहुत समय पहले की बात है, काफी दिनों से बारिश ना होने की वजह से एक गांव में सूखा पड़ गया था। हर तरफ हाहाकार मच गया। पानी की कमी के कारण लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा था। गांव में केवल एक ही आचार्य थे जो पढ़े-लिखे थे। लोगों ने उनसे इस समस्या के समाधान के लिए कोई उपाय खोजने को कहा। आचार्य ने सूखे को रोकने और गांव में बारिश हो जाए इसके लिए बहुत सारे प्रयास किए। लेकिन कोई भी प्रयास सफल नहीं हुआ। गांव में सूखे की समस्या पहले की तरह ही बनी हुई थी। गांव के लोगों के सामने सभी रास्ते बंद हो चुके थे। 
              बहुत दुखी हो कर और हाथ जोड़कर सभी गांव वाले भगवान से प्रार्थना करने लगे। तभी वहां भगवान द्वारा भेजा गया एक दूत पहुंचा और उसने गांव के लोगों से उनकी परीक्षा लेते हुए कहा, "अगर आज रात सभी लोग गांव के कुएं में बिना झाके एक लोटा दूध डालेंगे तो कल से ही आपके गांव में सूखे की समस्या कम हो जाएगी और बारिश हो जाएगी।" गांव के लोग खुश हुए और सभी लोग एक लोटा दूध डालने के लिए तैयार हो गए। रात को जब गांव के सभी लोग कुएं में दूध डालने लगे तब गांव के एक कंजूस व्यक्ति ने सोचा कि गांव के सभी लोग उस कुएं में तो दूध डालेंगे ही, अगर अकेला वह‌ कुएं में एक लोटा पानी डाल देगा तो रात के अंधेरे में किसी को पता नहीं चलेगा। यह सोचकर उसने कुएं में एक लोटा पानी डाल दिया।
          अगले दिन लोगों ने बारिश का इंतजार किया लेकिन अभी भी गांव में सूखा पड़ा हुआ था और बारिश का कोई नामोनिशान तक नहीं था। सब कुछ पहले जैसा ही था। लोग सोचने लगे की दूत की कही हुई बात सत्य साबित क्यों नहीं हुई? इस बात का पता लगाने के लिए सभी उस कुएं की तरफ़ देखने के लिए गए। उन्होंने कुएं में झांककर देखा तो सभी हैरान रह गए। पूरा कुआं केवल पानी से भरा हुआ था। उसमें एक भी बूंद दूध की नहीं थी। सभी ने एक दूसरे की ओर देखा और तभी सब समझ गए कि सूखे की समस्या अभी तक समाप्त क्यों नहीं हुई। दोस्तों, ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि जो बात उस कंजूस आदमी के दिमाग में आई थी कि सभी लोग तो दूध डालेंगे अगर वह एक लोटा पानी डाल देगा तो रात के अंधेरे में किसी को पता नहीं चलेगा, यही बात पूरे गांव वालों के दिमाग में भी आई थी और सभी ने दूध की जगह एक लोटा पानी कुएं में डाल दिया।

शिक्षा- दोस्तों! जो कुछ इस कहानी में हुआ आजकल यह हम सब के जीवन में होना एक सामान्य बात है। हम कहते हैं कि हमारे अकेले के बदलने से क्या समाज बदल जाएगा? पर याद रखिए अपने काम की ज़िम्मेदारी दूसरों पर डाले बिना काम को ईमानदारी और मेहनत से कर हम अकेले ही समाज में बदलाव लाने के लिए सक्षम है। याद रखिए, बूंद-बूंद से ही सागर बनता है। हम बदलेंगे, तभी हमारा देश बदलेगा।




Wednesday, 4 March 2020

ईमानदारी का ईनाम | Hindi

ईमानदारी का ईनाम


-सौ. भक्ति सौरभ खानवलकर
-कोलंबिया, साउथ कैरोलिना, यू. एस. ए.


        एक समय की बात है एक छोटे से कस्बे में जो एक नदी के किनारे बसा था, वहां मोनू नाम का एक आदमी रहता था। जो पेशे से पेंटर था। लोगों के घरों की पुताई करके इतना कमा लेता था कि बस पेट भरने के लिए दो वक्त की रोटी मिल जाती थी। मोनू बहुत ही मेहनती और ईमानदार व्यक्ति था। एक दिन उस कसबे का जमींदार मोनू के पास आया और उसे कहा कि वह उसकी नाव को सुंदर रंगों से रंग दे। जमींदार उसे उसका मेहनताना जो मोनू कहेगा वह दे देगा। नाव देखकर मोनू ने जमींदार से नाव को रंगने का शुल्क निश्चित किया। मोनू ने तुरंत अपना काम शुरू किया। लेकिन उसने देखा कि नाव में एक बड़ा छेद था। उसने अपनी सूझबूझ और ईमानदारी के चलते सबसे पहले नाव को दुरुस्त किया और फिर उस नाव को रंगा। खूबसूरत रंगी हुई नाव देखकर जमींदार खुश हुआ और उसने मोनू से कहा कल शाम को आकर अपना मेहनताना ले जाना। 
       अगले ही दिन सुबह जमींदार का परिवार उस नाव में सवार होकर नदी की सैर करने के लिए निकल गया। एक महीने की छुट्टी के बाद जमींदार के घर काम करने वाला नौकर उसी दिन लौटा और बाहर नाव ना देखकर जमींदार से नाव के बारे में पूछने लगा। जमींदार ने बताया कि उसका परिवार नाव में सवार होकर नदी में सैर करने के लिए गया है। यह सुनते ही नौकर ने जमींदार को बताया कि उस नाव के नीचे एक छेद था। यह बात सुनते ही जमींदार के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। लेकिन तभी नदी की सैर करके जमींदार का परिवार सकुशल घर लौट आया। यह देख जमींदार बहुत खुश हुआ।
        जब शाम को मोनू अपना मेहनताना लेने जमींदार के पास पहुंचा तो जमींदार ने मोनू को तय रुपए से अधिक रुपए दिए। जब मोनू ने रुपए गिने तो उसने जमींदार से कहा कि उन्होंने उसे गलती से अधिक रुपए दे दिए हैं। यह बात सुन जमींदार ने मोनू से कहा की उसने नाव के नीचे का छेद अपना काम समझकर ईमानदारी से दुरुस्त कर दिया और  ना ही उसके लिए कोई अतिरिक्त शुल्क मांगा। यदि वह ऐसा नहीं करता तो उसका परिवार नदी में बह जाता और वह अपने परिवार को खो देता। मोनू की सच्ची ईमानदारी और मेहनत से खुश होकर अधिक धन भेंट स्वरूप दिए।

शिक्षा- इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है की मेहनत के साथ-साथ मनुष्य को हर काम ईमानदारी से करते रहना चाहिए क्योंकि ईमानदारी का ईनाम मनुष्य को अपने जीवन में अवश्य मिलता है।


Tuesday, 3 March 2020

आलसी बेटा | Hindi

आलसी बेटा


-सौ भक्ति सौरभ खानवलकर
-कोलंबिया, साउथ कैरोलिना, यू. एस. ए.


एक छोटे शहर में एक व्यापारी रहता था। उसका बेटा बहुत आलसी था और हमेशा सोता ही रहता था। व्यापारी की दिनचर्या शिव मंदिर जाने के बाद अपने कारखाने जाकर अपना काम करना था। व्यापारी बहुत मेहनती और कर्मठ था। वह हमेशा अपने बेटे से कहता था कि वह उसके साथ जाकर व्यापार किस तरह किया जाता है यह समझे और जाने क्योंकि भविष्य में उसे ही पूरा व्यापार संभालना है। पर अपने आलस्य के कारण व्यापारी का बेटा उसकी बात नहीं मानता था। एक दिन व्यापारी बहुत बीमार पड़ा। धीरे-धीरे सारा धन उसके इलाज में खर्च होता गया। व्यापारी को अपनी बीमारी के चलते व्यापार में ध्यान नहीं देने के कारण काफी नुकसान उठाना पड़ रहा था। फिर भी व्यापारी का आलसी बेटा किसी भी बात पर ध्यान नहीं दे रहा था और आलस्य में हमेशा सोता रहता था।
एक बार उसकी मां ने कहा कि जाकर अपने कारखाने में देखो कि ठीक तरह से काम हो रहा है या नहीं। उसने अपनी मां की बात यह कह कर टाल दी कि उसे तो इन सब बातों का कोई ज्ञान ही नहीं है। कभी अपने पिता के साथ वह व्यापार सीखने नहीं गया। फिर उसकी मां ने उसे एक उपाय सुझाया कि उसे अपने नाना के पास, जो पास ही के गांव में रहते हैं, जाकर सलाह लेनी चाहिए की उसे व्यापार बचाने के लिए क्या करना चाहिए। अगले ही दिन वह अपने नाना के गांव गया। वहां नाना ने उसे सलाह दी कि वह अपने पिता की तरह दिनचर्या अपनाए और मेहनत करे। नाना ने उससे इस सलाह पर अमल करने का वादा भी करवाया। अगले दिन वह अपने शहर लौटा।
अपने पिता की तरह ही सुबह शिव मंदिर जाकर रोज़ कारखाने जाने लगा। उसे कारखाने में देख जो लोग गलत काम कर रहे थे जिससे व्यापार में नुकसान हो रहा था वह सावधान हो गए और ठीक से काम करने लगे। धीरे-धीरे व्यापार फिर से अच्छा चलने लगा। व्यापार के मुनाफे के पैसों से उसने अपने पिता का पूरा इलाज करवाया जिससे वह जल्दी ठीक हो गए और दोनों पिता-पुत्र मिलकर व्यापार करने लगे। सब पहले की तरह सामान्य होता देख वह अपने नाना को उनकी सलाह के लिए धन्यवाद देने दोबारा उनके गांव पहुंचा। उसके नाना ने कहा कि यह उनकी सलाह से नहीं बल्कि उसके आलस्य त्याग कर मेहनत का रास्ता अपनाने से संभव हो पाया है।

शिक्षा- इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन होता है। आलस्य को त्याग कर, निष्ठा और मेहनत से अपना काम करें तो ही अपने जीवन में सफल हो पाएंगे।

Sunday, 1 March 2020

होशियार बकरी | Hindi

होशियार बकरी


-सौ. भक्ति सौरभ खानवलकर
-कोलंबिया, साउथ कैरोलिना, यू. एस. ए.

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           एक गांव में एक किसान के पास भूरी नाम की एक बकरी थी। जिसके तीन छोटे बच्चे थे। जिनका किसान बहुत अच्छी तरह से ख्याल रखता था। किसान का घर गांव में सबसे आखिरी में जंगल के पास था। भुरी ने अपने बच्चों को बताया था कि उन्हें जंगल की ओर कभी नहीं जाना है वहां अन्य जंगली जानवर उन्हें कुछ भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। 
      एक दिन भूरी के एक बच्चे ने किसान के बेटे को किसी से बात करते सुना कि जंगल में बहुत सारा हरा चारा चारों तरफ फैला हुआ है। यह बात सुन भूरी के उस बच्चे में हरी घास खाने का लालच पैदा हुआ और वह हरी घास खाने जंगल की ओर निकल पड़ा। जब भूरी को इस बात का पता चला तो वह अपने बच्चे को ढूंढने के लिए जंगल की ओर निकल पड़ी। बुरी का बच्चा जंगल में थोड़ी दूर तक पहुंचा ही था की अचानक तीन सियार उसके सामने आ गए और वह उस बच्चे को अपना आहार बनाने के बारे में सोच ही रहे थे कि तब तक भूरी भी अपने बच्चे को ढूंढती हुई वहां पहुंच गई। 
       सियारों को अपने इर्द-गिर्द देखकर पहले वह भी थोड़ी घबराई लेकिन अगले ही क्षण अपनी सूझबूझ का इस्तेमाल करते हुए उसने एक तरकीब सोची और सियारों से कहा कि उसे और उसके बच्चे को यहां शेर छोड़ गया है आज वह शेर का शिकार हैं। यदि सियार उसे और उसके बच्चे को खा जाएंगे तो शेर उन्हें नहीं छोड़ेगा। उन सियारों को भूरी की बात झूठ लगी। तभी बुरी को वहां अचानक एक हाथी नज़र आया और उसने उन सियरों से कहा देखो शेर राजा ने हाथी को हमारी निगरानी के लिए रखा है यदि तुमने हमें हाथ भी लगाया तो हाथी शेर को तुम्हारे बारे में बता देगा कि तुम ने ही हम दोनों का शिकार किया है और फिर शेर राजा तुम्हें दंडित करेंगे। पास ही हाथी खड़ा देख सियारों को भुरी की बात सही लगी और शेर के डर से वे वहां से चले गए। भूरी तेज़ी से अपने बच्चे को लेकर वापस गांव आ गई। उसे अपने बच्चे के साथ सही सलामत देख उसके दूसरे बच्चे और किसान का परिवार बहुत खुश हुआ।

शिक्षा- इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि आपके सामने कितनी ही कठिन परिस्थिति ही क्यों ना आ जाए आपको बिना डरे, शांत मन से अपनी बुद्धि का उपयोग करते हुए, सूझबूझ से काम लेते हुए उस परिस्थिति से बाहर निकलने का प्रयत्न करना चाहिए।



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