Friday, 20 September 2019

कर्म: जो बोओगे वही काटोगे | Hindi


कर्म: जो बोओगे वही काटोगे



-सौ. भक्ति सौरभ खानवलकर
-कोलंबिया, साउथ कैरोलिना, यू.एस..

कर्मण्येवाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचन।
मां कर्मफलहेतुर्भूः मांते संङगोस्त्वकर्माणि।।

            श्रीमद् भगवत गीता के इस श्लोक का अर्थ है- मनुष्य को सिर्फ कर्म करने का अधिकार है, कर्म का फल देने का अधिकार भगवान का है। कर्म-फल की इच्छा से कभी काम मत करो और ना ही कर्म ना करने की आपकी प्रवृत्ति होनी चाहिए। 
दोस्तों, कर्म क्या है? मनुष्य द्वारा किए गए कर्मों का परिणाम किस प्रकार निर्धारित किया जाता है? इसी प्रकार के कई प्रश्न मनुष्य के मन में उठते हैं। वैसे कर्म एक विस्तृत विषय है और यदि इस पर चर्चा की जाए तो वह अनंत है। इसे समझना जाना इतना आसान नहीं है। सामान्यतः कर्म के बारे में व्यक्ति यही जानता है कि यह दो प्रकार के होते हैं - अच्छे और बुरे। जिस तरह के कर्म व्यक्ति अपने जीवन में करेगा उसे उसी के अनुरूप परिणाम मिलेगा। जब व्यक्ति खेत में बीज बोता है तो फसल की गुणवत्ता धरती की उर्वरता पर निर्भर करती है। ऐसे ही मनुष्य का प्रत्येक कर्म चाहे वह कितना ही छोटा क्यों ना हो फलीभूत होने की क्षमता रखता है और इसका फल इस पर निर्भर करता है कि वह कर्म अच्छा है या बुरा। कर्मों के नियम में भी यह बात कही है कि जैसा आप बोओगे वैसा ही काटोगे। कहते हैं व्यक्ति इस संसार में अकेला एवं खाली हाथ जन्म लेता है और वैसा ही वह मृत्यु को प्राप्त होता है। परंतु यह मिथ्या है। वह इस संसार में खाली हाथ तो अवश्य आता है लेकिन अपने किए गए कर्मों को साथ लेकर जाता है।
नीचे लिखी हुई कहानी के माध्यम से कर्म क्या है, आइए जानने की कोशिश करते हैं। एक व्यक्ति था। उसके तीन मित्र थे। एक मित्र ऐसा था जो सदैव साथ रहता था। एक पल, एक क्षण भी बिछड़ता नहीं था। दूसरा मित्र ऐसा था, जो सिर्फ सुबह शाम मिलता था। और तीसरा मित्र ऐसा था, जो बहुत दिनों में कभी-कभी मिल जाता था। एक दिन उस व्यक्ति को किसी कारणवश अदालत जाना था और किसी को अपने साथ गवाह बनाकर ले जाना था। अब व्यक्ति सबसे पहले अपने उस मित्र के पास गया जो सदैव उसका साथ देता था और बोला, "मित्र क्या तुम मेरे साथ अदालत में गवाह बनकर चल सकते हो?" वह मित्र बोला, "माफ़ करो दोस्त। मुझे तो आज फुर्सत नहीं।" उस व्यक्ति ने सोचा कि 'यह मित्र मेरा हमेशा साथ देता था पर आज मुसीबत के समय इसने मेरा साथ देने से इनकार क्यों कर दिया? अब दूसरे मित्र से मुझे क्या आशा है?' फिर भी हिम्मत रख कर दूसरे मित्र के पास गया जो सुबह-शाम मिलता था और अपनी समस्या सुनाई। दूसरे मित्र ने कहा, "मेरी एक शर्त है कि मैं सिर्फ अदालत के दरवाज़े के पास तक आऊंगा अंदर तक नहीं।" वह बोला, "बाहर के लिए तो मैं ही बहुत हूं। मुझे तो अंदर के लिए गवाह चाहिए।" फिर वह थक हार कर अपने तीसरे मित्र के पास गया जो बहुत दिनों में मिलता था और अपनी समस्या सुनाई। तीसरा मित्र उसकी समस्या सुनकर तुरंत उसके साथ चल दिया। अब आप सोच रहे होंगे कि वह तीन मित्र कौन हैं? तो चलिए इस कथा का सार जानते हैं। जैसे कहानी में तीन मित्रों की बातों का वर्णन है, उसी प्रकार हर व्यक्ति के तीन मित्र होते हैं। सबसे पहला मित्र है - व्यक्ति का 'शरीर', व्यक्ति जहां भी जाएंगा शरीर रूपी पहला मित्र हमेशा उसके साथ रहेगा। हर पल, हर क्षण वह कभी उससे दूर नहीं होगा। दूसरा मित्र है - शरीर के 'संबंधी' जैसे माता-पिता, भाई-बहन, मित्र, परिचित इत्यादि, जिनके साथ व्यक्ति रहता हैं। जो सुबह, दोपहर, शाम मिलते हैं। तथा तीसरा मित्र है - 'कर्म', जो सदैव व्यक्ति की आत्मा के साथ जाता है। ज़रा सोचिए, आत्मा जब शरीर छोड़कर धर्मराज की अदालत में जाती है, उस समय शरीर रूपी पहला मित्र एक कदम भी आगे चलकर साथ नहीं देता। जैसा कि उस पहले मित्र ने साथ नहीं दिया। दूसरा मित्र यानी कि संबंधी जो अदालत के दरवाज़े तक साथ आते हैं और वहां से वापस लौट जाते हैं। तीसरा मित्र, व्यक्ति के कर्म जो सदा ही साथ जाते हैं चाहे अच्छे हों या बुरे, कर्म सदा व्यक्ति के साथ चलते हैं। 
व्यक्ति अच्छा और बुरा दोनों ही सोचता है पर जिसका स्मरण वह ज्यादा करता है, वैसी ही उसकी प्रवृत्ति हो जाती है। प्रवृत्ति धीरे-धीरे स्वभाव स्वभाव से आचरण और फिर आचरण से जीवन में आने लगती है और फिर व्यक्ति वैसा ही हो जाता है जैसा वह सोचता है और व्यक्ति की अच्छी और बुरी सोच ही उसे अच्छे या बुरे कर्म करने के लिए प्रेरित करती है। आपको दूसरे व्यक्ति क्या बोलते हैं, आपके बारे में क्या सोचते हैं, आपके लिए क्या करते हैं, यह उनका कर्म है और इसी का विपरीत आपका कर्म है। इसीलिए व्यक्ति को सदैव सकारात्मक अच्छा ही सोचना चाहिए और हमेशा अच्छे कर्म बिना किसी फल की अपेक्षा किए करते चले जाना चाहिए क्योंकि इंसान की दुनिया में उसके कर्म से ही पहचान होती है। व्यक्ति जो आज है, यह उसके पूर्व में किए हुए कर्मों का परिणाम है और उसके वर्तमान कर्म उसका भविष्य निर्धारित करते हैं। जिस प्रकार व्यापारी के पास उसके व्यापार का बहीखाता होता है उसी प्रकार ईश्वर के पास प्रत्येक जीव के कर्मों का बहीखाता होता है जिसके आधार पर उसे उसके कर्मों का फल प्राप्त होता है। कर्म एक ऐसा रेस्टोरेंट है जहां पर कोई मैन्यू नहीं होता। आपको वही परोसा जाता है जो आपने पकाया है। अंत में दोस्तों अपने शब्दों को मैं इस सुविचार के साथ विराम देती हूं-
यह ज़रूरी तो नहीं कि इंसान हर रोज़ मंदिर जाए।
बल्कि
इंसान के कर्म ऐसे होनी चाहिए कि इंसान जहां भी जाए मंदिर वहीं बन जाए।


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Friday, 13 September 2019

हिंदी: हमारा गौरव | Hindi


हिंदी: हमारा गौरव


-सौ. भक्ति सौरभ खानवलकर
-कोलंबिया, साउथ कैरोलिना, यू.एस..


निज भाषा उन्नति अहै,
सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के,
मिटत न हिय को सूल।।


             १४ सितंबर 'हिंदी दिवस' हर हिंदुस्तानी के लिए गर्व का दिवस, हिंदुस्तान की राष्ट्र भाषा का दिवस। इस दिन भारत की संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदू भाषा को भारत गणराज्य की आधिकारिक भाषा घोषित किया था। भारत की संविधान सभा ने १४ सितंबर १९४९ को भारत गणराज्य की आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी को अपनाया था। हालांकि इसे २६ जनवरी १९५० को देश के संविधान द्वारा आधिकारिक भाषा के रूप में इस्तेमाल करने के विचार को मंजूरी दी गई थी। हिंदी को आधिकारिक भाषा के स्वीकृति के दिन को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। हिंदी भाषा देवनागरी लिपि में लिखी गई है। इसकी सरलता का उदाहरण है कि यह जिस तरह लिखी जाती है बिल्कुल उसी तरह पढ़ी भी जाती है। इसके वर्णों तथा शब्दों का उच्चारण व्यक्ति के बोलने से संबंधी सभी अंगों का संतुलित विकास व उपयोग को ध्यान में रखकर निर्धारित किया गया है। हमारी राष्ट्रीय भाषा के साथ ही हमारी संस्कृति के महत्व पर ज़ोर देने और हर पीढ़ी के बीच इसको बढ़ावा देने के लिए इस दिन को मनाया जाता है। यह दिन हर साल देश के विभिन्न भाषी लोगों को एकजुट करता है‌ तथा हमारी भाषा, संस्कृति और मूल्य प्रत्येक भारतवासी के साथ सदैव बरक़रार रखता है। हिंदी दिवस इसके लिए एक अनु-स्मारक के रूप में जाना जाता है। हिंदी दिवस एक ऐसा दिन है जो देशभक्ति की भावना के लिए प्रेरित करता है। इस दिन को स्कूलों, कॉलेजों और कार्यालयों में भी बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है। उत्सव मनाने के लिए लोग भारतीय पारंपरिक परिधान पहनते हैं। कई लोग हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति के महत्व के बारे में बात करने के लिए आगे आते हैं। विद्यालय हिंदी वाद-विवाद, कविता और कहानी की प्रतियोगिताओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। इसी के साथ हिंदी भाषा के बारे में कई दिलचस्प तथ्य हैं जैसे
  • हिंदी में कई शब्द संस्कृत से प्रेरणा लेते हैं।
  • हिंदी को पूरी तरह ध्वन्यात्मक लिपि में लिखा गया है। इस भाषा के शब्दों को उसी तरह स्पष्ट किया जाता है जिस तरह से वे लिखे गए हैं।
  • दुनिया भर में ऐसे कई शब्दों का प्रयोग किया जाता है जो लगता है कि अंग्रेजी के शब्द हैं परन्तु वास्तव में ये शब्द हिंदी भाषा से हैं। इनमें से कुछ शब्द जंगल, लूट, योग, कर्म, अवतार और गुरु हैं।
  • हिंदी भाषा में सभी संज्ञाओं में लिंग हैं। ये या तो स्त्रीलिंग हैं या पुल्लिंग हैं। इस भाषा में विशेषण और क्रियाएँ लिंग के आधार पर भिन्न होती हैं।
  • यह उन सात भाषाओं में से एक है जो वेब एड्रेस बनाने के लिए उपयोग की जाती हैं।
  • दुनिया में हर ध्वनि हिंदी भाषा में लिखी जा सकती है।
  • हिंदी भाषा का प्रयोग सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया भर के अन्य देशों में भी किया जाता है जिनमें पाकिस्तान, फिजी, नेपाल, श्रीलंका, सिंगापुर, न्यूजीलैंड, यूनाइटेड अरब एमिरेट्स और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं।
          भारत महान संस्कृतियों व हिंदी जैसी महान भाषा का देश है। परंतु आज के समय में अंग्रेजी की ओर झुकाव तथा पाश्चात्य संस्कृति को अपनाने की होड़ में युवा अपने देश की मातृभाषा को भूल अंग्रेजी की ओर ज़्यादा आकर्षित हो रहे हैं। मातृभाषा को ओछा एवं पिछड़ा समझना, लोगों के सामने उसे बोलने पर शर्म महसूस करना और इसीलिए अंग्रेजी में बातचीत करना यह काफी आम बात हो गई है। युवाओं को कई शैक्षणिक संस्थानों में भी अंग्रेजी पर ही ज़ोर देना सिखाया जाता है। अनिवार्य रूप से अंग्रेज़ी में ही आपस में बातें करनी होती हैं। किंतु हिंदी भाषा अर्थात् अपनी मातृभाषा का भी उतना ही सम्मान करना विद्यार्थियों को सिखाना आवश्यक है। यह सत्य है कि अंग्रेज़ी एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा है और युवाओं को अपने उज्जवल भविष्य के लिए, अपनी प्रगति के लिए देश-विदेश में अपना नाम कमाने के लिए अंग्रेजी भाषा का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है। परंतु यह स्मरण रहना चाहिए कि हमारी मातृभाषा भी उतनी ही सम्माननीय है। इसके महान होने का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि कई बड़े विदेशी विश्वविद्यालयों में संस्कृत और हमारी संस्कृति एक शोध का विषय है। विदेशी भी हमारी मातृभाषा के महत्व को समझने लगे हैं तथा अपने संपूर्ण उत्थान के लिए भारतीय संस्कृति को अपना रहे हैं। एक ओर विदेशों में हमारी भाषा और संस्कृति को बेहतर समझा जा रहा है और दूसरी ओर हमारे ही देश के कुछ युवाओं को हिंदी लिखने व पढ़ने में कठिनाई होती है। यह भारतवासियों के लिए, जो एक युवा प्रधान देश है, चिंतन की बात है। आज की पीढ़ी को यह नहीं भूलना चाहिए कि हम पहले भारतीय हैं और हमें हमारी राष्ट्रीय भाषा का सम्मान करना चाहिए। इसे इतना विस्तृत करना चाहिए तथा इसके महत्व को विश्व के कोने-कोने तक पहुंचाना चाहिए कि लोग हिंदी भाषा की गुणवत्ता सही ढंग से समझें। हिंदी हमारी पहचान है। यह सिर्फ एक भाषा ही नहीं बल्कि हमारा गौरव है जिसका सम्मान प्रत्येक भारतीय को करना ही चाहिए।

हिंदुस्तान की गौरव गाथा हिंदी,
एकता की अनुपम परंपरा है हिंदी,
जिसके बिना हिंद थम जाए,
ऐसी जीवन रेखा है हिंदी,
सरल शब्दों में कहा जाए तो,
जीवन की परिभाषा है हिंदी,
हिंदुस्तान की शान है हिंदी,
हर हिंदुस्तानी की पहचान है हिंदी।

आप सभी को १४ सितंबर - 'हिंदी दिवस' की अनेक शुभकामनाएं।




Friday, 6 September 2019

समय बड़ा बलवान | Hindi


समय बड़ा बलवान




-सौ. भक्ति सौरभ खानवलकर
-कोलंबिया, साउथ कैरोलिना, यू. एस. .




आज के समय में यदि कोई सबसे शक्तिशाली है तो वह है 'समय' यानी कि वक्त। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में समय का बहुत महत्व होता है| एक बार यदि समय गुज़र जाए तो उसे वापस नहीं लाया जा सकता। जो लोग समय का सदुपयोग करते हैं उनका जीवन सफल हो जाता है| हर एक व्यक्ति को समय के साथ चलना पड़ता है। समय अपनी गति से चलता रहता है। ना तो वह किसी की प्रतीक्षा करता है, ना किसी के लिए अपनी चाल तेज़ या धीमी करता है और ना ही समय को रोक पाना संभव है। हर किसी के जीवन में अच्छा और बुरा समय आता है| समय का महत्व समझने वाला व्यक्ति अपनी बुद्धि और क्षमता के अनुसार समय का सही उपयोग करता है तथा बुरा समय आने पर भी अपनी मेहनत तथा धैर्य से यशस्वी हो जाता है|
समय बहुत कीमती होता है| यदि मनुष्य समय का महत्व समझता है तो उसे उसका सदुपयोग करना भी भली-भांति आना चाहिए। यदि व्यक्ति अपने जीवन में कुछ हासिल करना चाहता है या कुछ बनना चाहता है तो उसके लिए यह अनिवार्य है कि वह समय की कीमत को समझे क्योंकि समय से बड़ा गुरु और बलवान इस संसार में दूसरा कोई नहीं होता। श्री कृष्ण ने भगवद गीता में कहा है, "परिवर्तन ही संसार का नियम है"। तो क्या यह परिवर्तन अपने आप होता है? यह परिवर्तन समय की ताकत है। जिस प्रकार समय आगे बढ़ता जाता है उसी प्रकार संसार में भी परिवर्तन होता जाता है। जिसे रोक पाना असंभव है। समय ही तो है जो सब कुछ बदलने की क्षमता रखता है। चाहे व्यक्ति का समय अच्छा हो या बुरा, उसे समय के साथ चलते हुए अपने जीवन में आने वाले परिवर्तन तथा परिस्थितियों का डटकर सामना करते आना चाहिए| जो व्यक्ति समय के साथ चलता है वो अपने जीवन में सफलता प्राप्त करता है| जो व्यक्ति अपने जीवन में समय की बर्बादी करता है उसका जीवन निरर्थक बन जाता है |

तू खुद की खोज में निकल
तू किस लिए हताश हैं,
तू चल तेरे वजूद की
समय को भी तलाश है।

भगवान ने मनुष्य को अपने जीवन में सफलता पाने के लिए तीन रास्ते दिए हैं | एक बचपन, दूसरा जवानी और तीसरा बुढ़ापा | लेकिन जो व्यक्ति उम्र के इन पड़ाव पर समय का लाभ उठाता है, वो ही सफल होता है| विद्यार्थी जीवन मनुष्य के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। यह वक्त काफी हद तक व्यक्ति के भविष्य को निर्धारित कर देता है। जो व्यक्ति विद्यार्थी जीवन में अपने समय का उपयोग कर खुद को मानसिक, शारीरिक और ज्ञान से आत्मनिर्भर बनाता है उस व्यक्ति का भविष्य उज्जवल हो जाता है। समय की बर्बादी ही मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन होता है। जो उसके भविष्य को अंधकारमय बना देता है। मुख्यतः व्यक्ति के साथ समस्या यह होती है कि वह अपने बीते हुए कल के बारे में सोच कर अपना समय बर्बाद करता है या आने वाले कल के बारे में सोच कर अपना समय खो देता है। कल का मतलब होता है काल, जो मनुष्य के हाथों में नहीं है। या तो वह बीत चुका है या अभी आया नहीं है। व्यक्ति के पास सिर्फ वर्तमान होता है। यदि वह इस वर्तमान में जीते हुए समय के साथ चलेगा तो अवश्य ही सफल होगा।
समय एक अमूल्य धन है। यह रेत सामान होता है जो कभी मुट्ठी में नहीं ठहरती बस फिसलती चली जाती है। यह मनुष्य की मूल्यवान संपत्ति है | हर एक व्यक्ति के जीवन में समय का बहुत महत्व है | चाहे कोई राजा हो या रंक सभी को समय के सामने झुकना पड़ता हैं | इसलिए गीता में भी लिखा गया है कि 'समय बड़ा बलवान है।' इसलिए हर एक मनुष्य को इसे व्यर्थ नहीं गवाना चाहिए | मनुष्य को समय के महत्व को समझना चाहिए| यदि मनुष्य समय की कीमत नहीं करेगा तो समय भी उसकी कीमत नहीं करेगा। इस संसार में चार बहुत अच्छी आदते हैं - समय का पालन करना, यथार्थ दृष्टी, कार्य कुशलता और कर्तव्य परायणता। इन चार आदतों के बल पर मनुष्य अपने जीवन में सफलता प्राप्त करता हैं।

वक्त से लड़कर अपना नसीब बदल दे,
इंसान वही जो अपनी तकदीर बदल दे,
कल क्या होगा उसकी कभी न सोच,
क्या पता कल वक्त खुद अपनी लकीर बदल दे।