Friday, 9 August 2019

सफलता का फल | Hindi


सफलता का फल



    - सौ. भक्ति सौरभ खानवलकर
    - कोलंबिया, साउथ केरोलिना, यू. एस. .

           सफलता का स्वाद कौन नहीं चखना चाहता। हर व्यक्ति अपने जीवन में सफलता के शिखर को छूना चाहता है। परंतु प्रश्न यह है की सफलता पाने के लिए व्यक्ति कितना प्रयत्न करता है? यह तो सभी ने सुना है जो बोओगे वही काटोगे। यदि प्रयत्न सही दिशा में सही तरह से किया जा रहा है तो सफलता के उसी फल का स्वाद चखने को मिलेगा जिसका बीज बोया है। जिस तरह वृक्ष लगाने के लिए उसका बीज बोने से लेकर फलों से लदा वृक्ष होने तक वक्त लगता है, उसके पीछे मेहनत लगती है, उसी प्रकार सफलता के मार्ग पर आने वाली चुनौतियों व परिस्थितियों से बिना हारे अपने चुने गए पथ पर आगे बढ़ते रहना ही व्यक्ति को सफलता की ओर ले जाता है। यदि इस मार्ग में कहीं असफल भी हुए तो बिना पीछे मुड़े उतनी ही मेहनत के साथ आगे बढ़ते रहना ही सफलता के लिए असली प्रयत्न है।
             सफलता पाने के लिए व्यक्ति का एक निर्धारित लक्ष्य तय होना आवश्यक है। यदि व्यक्ति एक लक्ष्य निश्चित कर उस पर विचार कर आने वाली सकारात्मक व नकारात्मक तथा सभी प्रकार की परिस्थितियों का विश्लेषण कर आगे बढ़े तो सफलता के द्वार उसके लिए अपने आप ही खुलते चले जाएंगे। मात्र विचार कर लेने से किसी व्यक्ति को सफलता प्राप्त नहीं होती कहते हैं ना जो बरसते हैं वह कभी गरजते नहीं। अर्थात् जो व्यक्ति अपने जीवन में सफल और उच्च स्थान पर होते हैं वह कभी भी कुछ बोलते नहीं हैं केवल अपने लक्ष्य को ध्यान में रख बस अपना कर्म और मेहनत करते चले जाते हैं। फिर चाहे इस मार्ग में वह अकेले ही क्यों ना हो। उन्हें कभी किसी से बाहरी प्रोत्साहन की कोई आवश्यकता नहीं होती।
जिंदगी की राह में तू अकेला ही आया है राही,
मंजिल की खोज में तू आगे बढ़ते चले जा अकेला तो अकेला ही सही,
डरकर पीछे ना मुड़ना थककर कभी न हारना, राह पर तुझे मिल ही जाएगी तेरी मंजिल कहीं।
            सफलता पाने के मंत्र कई जगह सुने या पढ़े होंगे। परंतु सबसे सरल कुछ बातें हैं जिन्हें यदि व्यक्ति अपने दैनिक आचरण में अथवा दैनिक कार्यों में शामिल करें तो वाकई ये बातें उसकी सफलता के लिए सफलता मंत्र बन सकती हैं। यदि किसी कार्य में सफलता चाहिए या वाकई जीवन में कुछ कर दिखाना है, तो यदि इसके लिए स्वयं की कुछ आदतें या स्वयं को बदलना भी पढ़ें, तो इस बात से कभी कतराना नहीं चाहिए। सफलता का एक मूल मंत्र है एक्सेप्टेंस अर्थात् स्वीकार करना, यदि व्यक्ति दूसरों की बताई गई बातें जो स्वयं के बारे में है या स्वयं के हित में है को स्वीकार कर उस पर आचरण करना सीख जाए तो यह सफलता के मार्ग में पहला कदम होगा। परंतु यह स्मरण रहे कि सफलता का जुनून अपने ऊपर इतना हावी ना होने दें कि सफलता के मार्ग के अलावा अपने आसपास कुछ नज़र ही ना आए। अपनी व्यावसायिक एवं निजी ज़िंदगी में सामंजस्य बनाकर चलना सफलता के मार्ग पर दूसरा कदम है। मैनेजमेंट, जहां मैनेजमेंट की बात आती है दोस्तों, सबसे पहले हमें घड़ी नज़र आती है अर्थात् ही हम टाइम मैनेजमेंट के बारे में सोचना शुरू कर देते हैं। पर यह बिल्कुल सही बात है जिस तरह प्राकृतिक का हर काम समय के अनुसार चलता है उसी प्रकार व्यक्ति को समय के अनुसार अपने सारे कार्य करने चाहिए। यदि मनुष्य समय की कीमत नहीं करेगा तो समय भी उसकी कभी कीमत नहीं करेगा। यह मुख्य बातें जो सफल जीवन जीने के लिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक हैं। आशा है प्रमुख बातों को ध्यान में रखकर आप सफलता की ओर सदैव अग्रसर रहेंगे।
किसी ने खूब कहा है-
रख हौसला वह मंजर भी आएगा,
प्यासे के पास चलकर समंदर भी आएगा,
थक कर ना बैठ ए मंजिल के मुसाफिर,
मंजिल भी मिलेगी और मिलने का मज़ा भी आएगा।






Friday, 2 August 2019

आत्मरक्षा का महत्व | Hindi


आत्मरक्षा का महत्व


- सौ. भक्ति सौरभ खानवलकर

- कोलंबिया, साउथ कैरोलिना, यू.एस..


          आजकल अपराध जगत के पैर इस कदर फैलते जा रहे हैं कि महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा पर कई सवाल खड़े होने लगे हैं। ऐसे में इन अपराधियों से कैसे निपटा जाए और अपनी स्वयं की व अपनों की सुरक्षा किस प्रकार की जाए यह प्रत्येक व्यक्ति को समझना आवश्यक है। आए दिन डकैती, चेन खींचना, लूटपाट, रेप आदि कई घटनाओं की खबरें आती हैं। इंसान स्वयं को खुद के घर में भी सुरक्षित महसूस नहीं करता। ऐसे में जरूरी है कि प्रत्येक व्यक्ति को इन स्थितियों के लिए तैयार रहना चाहिए। सतर्कता के साथ यह भी ज़रूरी है कि कभी ऐसी स्थिति आए तो इसे लड़ सकें और ऐसा करने वाले को अच्छा सबक सिखा सकें। जिसके लिए आत्मरक्षा का महत्व व किस प्रकार आत्मरक्षा करनी चाहिए का ज्ञान होना आवश्यक है।
          आत्मरक्षा से अभिप्राय खुद की रक्षा करने से हैं। भारतीय दंड संहिता की धारा 96 से लेकर धारा 106 ने हमें आत्मरक्षा का अधिकार दिया है। हर व्यक्ति को अपने इस अधिकार के प्रति जागरूक होना चाहिए। आत्मरक्षा के तरीके हर व्यक्ति को आने चाहिए। महिलाएं भी स्वयं को खतरे में पाकर आत्मरक्षा के अधिकार का प्रयोग कर सकती है और खुद को कोई भी जानमाल की हानि होने से बचा सकती है। आत्मरक्षा का अधिकार जगह और परिस्थिति पर भी निर्भर करता है। किसी को बिना वजह पीटना आत्मरक्षा नहीं होती। आत्मरक्षा तब तक मान्य है जब आपके सामने कोई खतरा हो और आप खुद को उससे बचाने की कोशिश करें।
आत्मरक्षा करने हेतु कुछ सेल्फ डिफेंस तकनीक सीखना ज़रूरी है जैसे - पहला, महिलाएं अपने नाखूनों से अनचाही परिस्थितियों में अपनी रक्षा कर सकती हैं। दूसरा, कलाई मरोड़ना, डराने और धमकाने के लिए सबसे सही तरीका है। यदि आपके साथ कोई छेड़खानी या बदतमीजी करता है तो तुरंत पलट कर उसकी कलाई मजबूती से पकड़े आंखों में आंखें डाल कर उस पर चिल्लाएं। तीसरा, अपने साथ अपनी पर्स में एक सिटी रखें रात को या सुनसान जगह पर कोई गलत व्यवहार करे तो पूरी ताकत के साथ उसे पीछे धकेलकर सीटी बजाना शुरू करें। चौथा, यदि आप घर में है और कोई हमला करने का प्रयत्न करता है तो दौड़कर रसोई घर में जाइए बर्तनों को फेंक कर शोर मचा सकते हैं।
          अपनी सुरक्षा के लिए शरीर को मज़बूत बनाना और खुद को अलर्ट रखना जितना ज़रूरी है उतना ही ज़रूरी है आत्मरक्षा की कला में निपुण होना। आजकल ना सिर्फ़ स्कूलों में बल्कि फिटनेस सेंटर वह हेल्थ क्लब में महिलाओं के लिए तरह-तरह के सेल्फ डिफेंस वर्कआउट होते हैं। जूडो, कराटे, ताइक्वांडो, कुंग फू आदि ऐसी कलाएं हैं जिनका उपयोग मुश्किल समय में करके आत्मरक्षा की जा सकती है। खासतौर पर उन स्थितियों में जब आप बिल्कुल असहाय हो। अक्सर मुश्किल घड़ी में हमारा सिक्स्थ सेंस हमें इशारे करता है कि हम कहां सुरक्षित है और कहां नहीं। महिलाओं का यह सिक्स्थ सेंस और भी सजक होता है। तो अगर अपनी सुरक्षा को लेकर आपके मन में कोई भी संशय हो तो उसे दबाने की जगह उस पर गौर करें इसके लिए यह भी ज़रूरी है कि आप तुरंत निर्णय लेने के लिए हमेशा तैयार रहें। इसे आप किसी अप्रत्याशित घटना का शिकार होने से बच सकेंगे। अपनी खुद की रक्षा करना हर व्यक्ति को आना चाहिए और उसे खुद को इतना सक्षम बनाना चाहिए कि वह अपनों की तथा स्वयं की रक्षा कर सकें। हमारी खुद की रक्षा हमारे हाथों में है और हमें इसका प्रयोग करना आना चाहिए जिस दिन सब आत्मरक्षा करना सीख जाएंगे उस दिन हम बिना किसी डर के सुरक्षित समाज का निर्माण कर पाएंगे।



अपना व अपनों का ध्यान रखें व हमेशा सुरक्षित रहें।




Friday, 26 July 2019

कोई भी कार्य बड़ा या छोटा नहीं होता | Hindi


कोई भी कार्य बड़ा या छोटा नहीं होता




-सौ. भक्ति सौरभ खानवलकर
-कोलंबिया, साउथ कैरोलिना, यू. एस. .



           इस संसार में जिस प्रकार प्रत्येक मनुष्य एक दूसरे से भिन्न दिखते हैं। उनकी आदतें भिन्न होती है। उसी प्रकार मनुष्य की कार्यक्षमता अथवा कार्य भी अलग-अलग होते है। तथा वह व्यक्ति स्वयं के कार्य में पूर्णतः निपुण व कार्य संबंधित ज्ञान रखता है। प्रत्येक मनुष्य की रुचि व विचार अलग होने के कारण उन्हें क्या कार्य करना है वे स्वयं ही इस बात का निर्णय लेते हैं। किसी भी प्रकार का कार्य कभी छोटा या बड़ा नहीं होता। यदि प्रत्येक मनुष्य यही विचार करने लगे कि उसके द्वारा किए जाने वाला कार्य ही श्रेष्ठ है और अन्य लोगों द्वारा किया जाने वाला कार्य उसके कार्य से कम है अथवा तुच्छ है तो मनुष्य की यह सोच पूर्णतः गलत है। यदि मनुष्य इसी तरह विचार करता रहेगा तो वह कभी भी दूसरों का आदर नहीं कर पाएगा और उनके कार्यों को तुच्छ समझ सदैव उनकी आलोचना व निंदा ही करता रहेगा।
           इस बात को यदि एक छोटी-सी कहानी के माध्यम से समझे तो शायद इस बात का मनुष्य एहसास कर पाएंगा कि कोई भी कार्य या कम आसान नहीं होता। कहानी कुछ इस प्रकार हैं-
एक मोहन नाम का मैकेनिक एक गराज चलाता था। वैसे तो मोहन एक अच्छा आदमी था। लेकिन उसके अंदर एक कमी थी। वह अपने काम को बड़ा और दूसरों के काम को हमेशा छोटा ही समझता था। एक बार एक हार्ट सर्जन अपनी लग्जरी कार लेकर उसके यहां सर्विसिंग करने पहुंचे। डॉक्टर से बातचीत करने के दौरान मोहन को पता चला कि यह कस्टमर एक हार्ट सर्जन है। तो उसने तुरंत पूछा डॉक्टर साहब," मैं यह सोच रहा था कि हम दोनों का काम एक जैसा ही है।" "एक जैसा! वह कैसे?" सर्जन ने थोड़ा अचरज से पूछा। "देखिए जनाब", मोहन कार के कॉम्प्लिकेटेड इंजन पर काम करते हुए बोला," यह इंजन कार का दिल है। मैं चेक करता हूं कि यह कैसे चल रहा है। मैं इसे खोलता हूं। इसके वाल्स फिट करता हूं। अच्छी तरह से सर्विसिंग कर के इसकी प्रॉब्लम्स खत्म करता हूं और फिर वापस जोड़ देता हूं। आप भी कुछ ऐसे ही करते हैं, क्यों??" "हम्म", सर्जन ने हामी भरी। "तो यह बताइए कि आपको मुझसे दस गुना अधिक पैसे क्यों मिलते हैं, काम तो आप भी मेरे जैसा ही करते हो?" मोहन ने खींचते हुए डॉक्टर की आलोचना करते हुए और अपने काम की डॉक्टर के काम से तुलना करते हुए यह प्रश्न किया। सर्जन ने एक क्षण सोचा और मुस्कुराते हुए बोला, "जो तुम कर रहे हो उसे चालू इंजन पर करके देखो समझ जाओगे।" मोहन को इससे पहले किसी ने ऐसा जवाब नहीं दिया था। अब वह अपनी गलती समझ चुका था।
         दोस्तों, हर एक काम का अपना महत्व होता है। अपने काम को बड़ा समझना ठीक है, पर दूसरों के काम को कभी-भी छोटा नहीं समझना चाहिए। व्यक्ति औरों के काम के बारे में बस ऊपरी तौर पर जानता हैं। लेकिन उसे करने में आने वाली कठिनाई के बारे में उसे कुछ नहीं पता होता। इसलिए किसी के काम को छोटा नहीं समझना चाहिए और उसका आदर करना चाहिए। दूसरों के कार्यों को छोटा ना समझना और अपनी तुलना किसी से नहीं करना ही मनुष्य को असल जिंदगी में महान आचरण वाला बनाता है।


कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता,
हर इंसान अपना काम बड़ी शिद्दत से करता है,
किसी के काम को या उस इंसान को मनुष्य की सोच ही छोटा या बड़ा बनाती है।





Monday, 22 July 2019

ऋतुओं की रानी - वर्षा | Hindi



ऋतुओं की रानी - वर्षा


-सौ. भक्ति सौरभ खानवलकर

-कोलंबिया, साउथ कैरोलिना, यू.एस..



          भारतवर्ष ऋतुओं का देश है। यहां पर प्रत्येक ऋतु प्राकृतिक शोभा के साथ आती है। अपने सौंदर्य की छठा को चारों ओर फैला देती है। सभी ऋतुओं की अपनी-अपनी विशेषताएँ और महत्व हैं, किंतु अपने मनोरम दृश्य तथा विविध उपयोगिता के कारण वर्षा ऋतु का अपना विशेष महत्व है। वर्षा ऋतु को ऋतुओं की रानी भी कहा जाता है। बारिश के पानी से पर्यावरण हरा-भरा, सुंदर, आकर्षक व शीतल हो जाता है। वर्षा ऋतु के आगमन से मन प्रसन्न हो जाता है। वर्षा ऋतु का मौसम लगभग सभी लोगों का पसंदीदा मौसम होता है। वर्षा झुलसा देने वाली भयंकर गर्मी के बाद राहत का एहसास लेकर आती है। यह मौसम मनुष्यों के साथ-साथ पशु-पक्षी व पेड़-पौधों के लिए भी एक वरदान की भांति है। वर्षा ऋतु का आगमन सावन के महीने में होता है और यह तीन महीने - श्रावण, आषाढ़ तथा भादो मास तक अपनी शोभा बनाए रखती है। इस मौसम में कई मुख्य त्योहार भी आते हैं जिन्हें भारत में धूमधाम से मनाया जाता है।
          वर्षा ऋतु की सौंदर्यता का जितना वर्णन किया जाए उतना कम है। जैसे ही वर्षा की बूंदें जमीन पर पड़ने लगती है वैसे ही अद्भुत भीनी-भीनी सुगंध उठने लगती है। पेड़-पौधों में नया जीवन आ जाता है और वे हरे-भरे हो जाते हैं तथा पक्षी भी चहकने लगते हैं। इनके अलावा इस मौसम में बनने वाले इंद्रधनुष की बात ही कुछ और है। यह मौसम बच्चों में भी खूब उमंग लेकर आता है। बारिश में नहाने के साथ-साथ कागज़ से बनी हुई नाव को पानी से भरे छोटे-छोटे गड्ढों में चलाने का अपना अलग ही एक मज़ा होता है। यही तो वह मौसम होता है जिसमें हर इंसान अपना बचपन पूरी तरह से जीता है। आम जनजीवन के अलावा वर्षा ऋतु का सबसे अधिक महत्व किसानों के लिए है क्योंकि खेती के लिए पानी की अत्यधिक आवश्यकता होती है जिससे फसलों को पानी की कमी ना हो। वर्षा से फसलों के लिए पानी मिलता है तथा सूखे हुए कुएँ, तालाब, नदियां तथा झरने आदि जल से भर उठते हैं। यह मौसम किसानों के लिए अत्यंत ही महत्वपूर्ण होता है। भारत में किसानों के लिए इंद्रदेव का बहुत महत्व है क्योंकि इंद्रदेव को वर्षा ऋतु का स्वामी माना जाता है। किसान इस मौसम में फसलों की तंदुरुस्ती के लिए भगवान इंद्रराज से अच्छी वर्षा की प्रार्थना करते हैं। फसलों की सिंचाई व खेतों को जोतने का कार्य वर्षा ऋतु के मौसम में ही किया जाता है।
          वर्षा ऋतु के कई फायदे है तो कई नुकसान भी है। एक तरफ यह लोगों को गर्मी से राहत देती है और किसानों के लिए फसल के लिहाज से भी बहुत फायदेमंद है वहीं दूसरी ओर इससे कई संक्रामक बीमारियों के फैलने का डर बना रहता है। जैसे कई प्रकार के त्वचा रोग, डायरिया, पेचिश, टाइफाइड और पाचन से संबंधित परेशानियां सामने आती है। इस कारण लोग अधिक बीमार पड़ते हैं। इसलिए इस ऋतु में लोगों को सावधानी से रहना चाहिए। बारिश का आनंद लेने के साथ-साथ संक्रमित बीमारियों से किस तरह बचा जाए इसका भी ध्यान रखना चाहिए व बारिश के पानी को संचित करने के उपाय ढूंढने चाहिए ताकि वर्षा के मौसम के बाद अगले वर्ष वर्षा आने तक जल का अभाव ना हो। वर्षा ऋतु में स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के साथ रोज़मर्रा की जिंदगी में भी कई परेशानियां सामने आती है। कभी-कभी ज्यादा वर्षा हो जाने के कारण जल प्रलय की स्थिति निर्माण होती है। कई जगह ज्यादा बारिश के वजह से गांव डूब जाते हैं और जन-धन की भी हानि होती है। बहुत ज़्यादा वर्षा के कारण खेत भी डूब जाते हैं और फसलें नष्ट हो जाती है। जिसका नुकसान किसानों को उठाना पड़ता है।
         उपरोक्त चर्चित की गई सभी परेशानियां जो वर्षा ऋतु के कारण हमारे समक्ष आती हैं से कैसे निजात पाया जाए इस संबंध में सरकार, नगर निगम व आम जनता को आगे आकर जन चेतना फैलानी चाहिए। स्वास्थ्य संबंधी निःशुल्क स्वास्थ्य केंद्र खोलने चाहिए व जरूरतमंद लोगों तक बीमारियों से निजात पाने के लिए मुफ़्त में दवाइयों को उपलब्ध करवाना चाहिए। जलभराव के कारण जन-धन की हानि रोकने के लिए वर्षा ऋतु के आगमन के पूर्व ही नदी-नालों की साफ़-सफ़ाई करवानी चाहिए तथा गड्ढों को समय रहते भरवा देना चाहिए ताकि जल जमाव ना हो। तथा आम जनता को जल जमाव के कारण किसी भी प्रकार की परेशानी का सामना ना करना पड़े।
         इस खूबसूरत मौसम का भरपूर आनंद उठाएं तथा अपना व अपनों का ध्यान रखें और सदैव स्वस्थ रहें। इस सुनहरे मौसम के लिए कुछ पंक्तियां-

सावन आया संग अपने हजारों खुशियां लाया।
आसमान में छाई काली घटा जैसे हो कोई बड़ी-सी छाया।

देख बरसते बादल को, पंछि ने भी पर लहराया।
झूम उठे वनस्पति को देख यह जग भी मुस्कुराया।


कागज़ की नाव लगी चलने पोखरों में,
भीग कर बरसात में, मैं फिर खो गया अपने बचपन में।


मिट्टी की सौंधी-सी खुशबू हरियाली है लाई,
देखो आसमान में सात रंग की चुनरिया लहराई।




Friday, 12 July 2019

श्री गुरुवे नमः | Hindi

श्री गुरुवे नमः


-सौ भक्ति सौरभ खानवलकर
-कोलंबिया, साउथ कैरोलिना, यू. एस. .

गुरुब्रह्मा, गुरुविष्णु:, गुरुर्दवो महेश्वर:
गुरु साक्षात् परब्रह्मा तस्मै श्री गुरवे नमः।।

                  जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए अर्थात् अज्ञान दूर कर मनुष्य को ज्ञान प्रदान करे वही 'गुरु' है। वास्तव में गुरु की महिमा का पूरा वर्णन कोई नहीं कर सकता। गुरु की महिमा तो भगवान से भी कहीं अधिक है। शास्त्रों में गुरु का महत्व बहुत ऊंचा है। गुरु शब्द दो अक्षरों से मिलकर बना है 'गु' का अर्थ है अंधकार (अज्ञान) एवं 'रु' का अर्थ है प्रकाश (ज्ञान)। गुरु मनुष्य को अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाता है। मनुष्य के जीवन में उसके प्रथम गुरु उसके माता-पिता होते हैैं। जो उसका इस संसार से परिचय करवाते हैं। बोलना, चलना, लिखना आदि अन्य कार्य उसे सिखाते है व अपने संस्कारों का ज्ञान देते हैं। अतः माता-पिता का स्थान सर्वोपरि है। परंतु भावी जीवन का निर्माण गुरुद्वारा ही किया जाता है। ज्ञान के बिना जीवन निरर्थक है और ज्ञान केवल गुरु से ही प्राप्त हो सकता है। इसलिए जीवन में गुरु का स्थान व महत्व बहुत ऊंचा है। हर वर्ष आषाढ़ पूर्णिमा के दिन हिंदू धर्म के अनुसार गुरु पूर्णिमा जो एक बहुत ही महत्वपूर्ण पर्व है के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व भारत के पौराणिक इतिहास के महान संत ऋषि व्यास की स्मृति में मनाया जाता है। ऋषि व्यास ने वेदों की रचना की थी। इस दिन को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन को समूचे भारतवर्ष में सभी गुरुजनों और शिक्षकों का सम्मान व उनकी वंदना कर मनाया जाता है।
                किसी भी व्यक्ति के सफलता में उसके गुरु की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। एक गुरु ही अपने शिष्य को सबसे उत्तम शिक्षा प्रदान करता है एवं भविष्य को सफल व सुनहरा बनाने हेतु मार्ग दिखाता है। गुरु अपने शिष्यों को ज्ञानवान, सुसंस्कृत तथा जीवन जीने की शिक्षा प्रदान करते हैं। शिष्यों अथवा विद्यार्थियों को अपने गुरु से ज्ञान प्राप्त करने हेतु श्रद्धा भाव से जाना चाहिए ताकि वे उत्तम ज्ञान अर्जित कर जीवन में सफल हो सकें। किसी ने सत्य ही कहा है 'श्रद्धावान लभते ज्ञानम्' अर्थात श्रद्धावान को ही ज्ञान प्राप्त होता है। गुरु का दायित्व बहुत बड़ा होता है व मानव-समाज को सही दिशा प्रदान करता है। तथा एक राष्ट्र के निर्माण में भी गुरु का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान होता है। गुरु में अपने विद्यार्थियों के प्रति ऊंच-नीच, जातिगत भेदभाव, इर्षा आदि दुर्गुणों का कोई स्थान नहीं होता है। उनके लिए सभी शिष्य समान होते हैं। कबीर दास जी कहते हैं-
गुरु कुम्हार शिष्य कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काई खोट। अंतर हाथ सहारि दे, बाहर मारे चोट।।
अर्थात् गुरु कुम्हार और शिष्य घड़ा है। जिस प्रकार कुम्हार घड़े को ढाल कर सुघड़ बनाता है उसी तरह गुरु भी विद्यार्थियों के दोषों का परिमार्जन करता है। गुरु विद्यार्थियों का शुभचिंतक होता है, वह बाहर से तो कठोर होता है किंतु अंदर से दयावान। अतः गुरु की डांट-फटकार को भी कड़वी दवाई की तरह अच्छा मान उसका सम्मान करना चाहिए।
                आजकल प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा भले ही समाप्त होती दिखाई दे रही हो परंतु शिक्षक का कर्तव्य अपनी जगह कायम है। शिक्षा प्राप्त करने के लिए विद्यार्थियों को आज भी लगन, परिश्रम, त्याग, नियमबध्दता, विनम्रता जैसे गुणों को धारण करने की आवश्यकता होती है। शिक्षक विद्यार्थियों को ऐसे गुणों से युक्त करता है व उसका मार्गदर्शन करता है जो उसे जीवन जीने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं जैसे कि साहस, धैर्य, सहिष्णुता, इमानदारी आदि। आज शिक्षा का रुप अलग व बड़ा हो गया है जिसमें नैतिक शिक्षा के साथ-साथ विषय-ज्ञान और तकनीकी शिक्षा का समावेश भी है। अतः शिक्षक का भी विषय-ज्ञान और तकनीकी-ज्ञान में निपुण होना आवश्यक है। अध्ययनशीलता शिक्षकों का एक आवश्यक गुण है। वे निरंतर अध्ययन करते रहते हैं ताकि नई बातें सीख कर अपने विद्यार्थियों को बता सकें। वे अपने विद्यार्थियों को किसी भी विषय-वस्तु के बारे में इतने सरल व प्रभावी ढंग से समझाते हैं कि बच्चे उनकी बातों को आजीवन ध्यान में रख सकें। गुरु सदैव सादा जीवन और उच्च विचार के सिद्धांत का अनुसरण करते हैं। मनुष्य को सदैव अपने गुरु का सम्मान करना चाहिए व उनकी दी हुई शिक्षा का अपने जीवन में अनुसरण करते हुए आगे बढ़ते रहना चाहिए। कबीर जी कहते हैं -
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पाय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताए।।

आप सभी को गुरुपौर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं।