Thursday, 18 April 2019

घरौंदा: सीख एक चिड़िया की | Hindi


घरौंदा: सीख एक चिड़िया की

- सौ. भक्ति सौरभ खानवलकर



          प्रकृति की एक खूबसूरत रचना है - चिड़िया। यह नन्हीं-सी चिड़िया जब अंडे से बाहर निकलती है, तो यह सोच बड़ी ही उत्सुक होती है, कि बाहर की यह दुनिया कितनी सुंदर, कितनी निराली होगी? जब वह बहुत छोटी-सी होती है तब उसके माता-पिता उसे दाना-पानी लाकर देते हैं। वह छोटी-सी चिड़िया अपने घोंसले को ही अपनी दुनिया समझने लगती है। पर वह अब धीरे-धीरे बड़ी होने लगती है। और एक दिन उसके माता-पिता उसे कहते हैं कि, "बेटा अब तुम्हारी शिक्षा का वक्त गया है, अब वक्त गया है कि तुम भी अपने पंख फैलाकर इस नील गगन में ऊंची उड़ान भरो।" यह सुन वह चिड़िया बड़ी ही खुश होती है और सोचने लगती है ऊंचे नील गगन में उड़ते हुए वह सुंदर प्राकृतिक दृश्य, ऊंचे-ऊंचे झरने देख पाएगी। पर जैसे ही उड़ान भरने के लिए वह अपने घोंसले से बाहर निकलती है और पेड़ से नीचे झुक कर देखती है तो घबरा जाती है और अपनी मां से कहती हैै, "मां, मैं यदि इस पेड़ से छलांग लगाऊं और अपने पंख फैलाकर उड़ ना पाऊं तो मैं तो जमीन पर गिर जाऊंगी, मुझे चोट लग जाएगी और फिर मैं कभी भी इस नील गगन में उड़ नहीं पाऊंगी।" उस नन्हीं- सी चिड़िया का डर देख कर उसकी मां उसे समझाती है, कि "तुम जमीन पर कभी गिर ही नहीं सकती क्योंकि तुम्हारे पास पंख है। तुम जब इस पेड़ से उड़ने के लिए छलांग मारोगी तो पक्षी जात के कारण तुम अपने पंख फैलाकर उड़ना सीख जाओगी। और यदि तुम्हें फिर भी डर लगे तो यह कभी मत भूलना तुम्हें संभालने के लिए तुम्हारे भाई-बहन, तुम्हारे मित्र हैं ही, हमेशा तुम्हारे साथ चलने वाले तुम्हारे पिता भी है, और मैं तो हूं ही ना। मेरी ममता तुम्हें कभी कुछ भी नहीं होने देगी।" यह सुन उस नन्हीं-सी जान को थोड़ा धीरज मिला। वह चिड़िया अपनी आंखें बंद कर अपने घोंसले से बाहर आई और पेड़ की डाली से कूद पड़ी और देखते-ही-देखते वह अपने पंख फैलाकर इस नील गगन में उड़ने लगी। यह नन्हीं-सी चिड़िया कब बड़ी हो गई पता ही नहीं चला। और एक दिन रोज़ की तरह इस नील गगन में उड़ने के लिए निकल पड़ी। इतनी दूर उड़ गई कि वह किसी को भी नजर नहीं आई। जाने वह कहां चली गई? जिस चिड़िया को उसके मां-बाप ने जन्म दिया, ऊंचे गगन में उड़ना सिखाया, स्वावलंबी बनाया, उस पर अच्छे संस्कार दिए, उसके मित्रों ने उसे पग-पग पर साथ दिया, भाई-बहन ने हमेशा उसे प्रोत्साहित किया, जाने वह उन सबको छोड़ इस नील गगन में कहां गुम हो गयी?
        मनुष्य अपने जीवन के कितने ही उच्च पद पर ही क्यों ना हो, कितना ही बड़ा क्यों हो गया हो, कितना ही यशस्वी क्यों ना हो गया हो, और जग में कहीं भी हो उसे अपने मां-बाप, अपने मित्रों, भाई-बहन को कभी नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने उसका हर वक्त हर समय साथ दिया हो। मनुष्य का यह यशस्वी होने का अहंकार उसे कभी पीछे मुड़कर देखने नहीं देगा। पर यदि भविष्य में कभी उसने ठोकर खाई और इस ठोकर की वजह से वह कभी गिरा भी तो उसे संभालने वाला भी कोई नहीं होगा। इसीलिए मनुष्य चिड़िया तो नहीं बन सकता पर चिड़िया का एक उत्तम गुण जरूर अपना सकते है। जिस प्रकार सुबह भोर होते ही चिड़िया अपने घोंसले से अपना दाना-पानी एकत्रित करने के लिए धरती पर दिनभर भटकती है, पर सूर्यअस्त के समय वह अपने घोंसले में पुनः लौट ही आती है। 
           
उपरोक्त उल्लेख की गई चिड़िया की चिंता आप मत कीजिए, वह आकाश में कितना ही ऊंचा क्यों ना उड़ी हो वह शाम को अपने घर लौट ही आई होगी। इस कहानी की शिक्षा यह है कि मनुष्य को अपनी किसी भी बात का कभी भी अहंकार नहीं करना चाहिए। हमेशा अपने लोगों से, अपनी मिट्टी से जुड़े रहना चाहिए। मनुष्य कितनी ही ऊंचाइयों को क्यों ना छू ले उसे लौट कर तो अपनों के पास ही आना ही पड़ता है। मनुष्य को यह कभी नहीं पाता होता है कि उसे अपने जीवन में कब कौन से रिश्ते की आवश्यकता पड़ेगी। इंसान को इंसान की ही ज़रूरत होती है। यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि  सभी को साथ लेकर और सभी के साथ ही सदैव चलना चाहिए। मनुष्य यदि अपने जीवन में चिड़िया का यह उत्तम गुण सीख ले तो वह अपनों से अलग होे जाने की गलती शायद कभी ना करे।

सत्य वचन-
गलतियां जीवन का एक पन्ना है,
परंतु रिश्ते पूरी किताब,
समय आने पर गलतियों का पन्ना फाड़ देना,
पर एक पन्ने के लिए पूरी किताब कभी मत खोना।

Friday, 12 April 2019

कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना... | Hindi

       

               कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना...

      -सौ. भक्ति सौरभ खानवलकर 

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               वैसे तो आजकल काफी नई-नई बीमारियां फैलती जा रही है। जिनके बारे में चिकित्सा जगत में डॉक्टरों ने भी नहीं सुना होगा। ऐसे कई तरह के वायरल इनफेक्शन फैलते जा रहे हैं। अरे घबराइए मत, मैं आपको बीमारियों व वायरल इंफेक्शन के बारे में भी जानकारी नहीं दे रही हूं। मैं तो बरसों पुराने रोग के बारे में बात कर रही हूं जिसका कभी कोई इलाज नहीं हो पाया है और ना ही कभी होगा शायद!!! उस रोग का नाम है, क्या कहेंगे लोग?? यह बीमारी पहले भी थी पर आज लोगों में ज्यादा विकसित होती नज़र आ रही है। क्योंकि किसी भी मनुष्य को बचपन से यही सिखाया जाता है कि उसे वही काम करना चाहिए जिससे उसकी समाज कभी कोई आलोचना ना करें। उसके रिश्तेदार व दोस्त उस पर कोई टिप्पणी ना करें। समाज में जो सभी व्यक्ति करते आ रहे हैं बस उन्हीं की तरह इस धारा में हर व्यक्ति को बहते चले जाना चाहिए। अलग हटकर काम करने वालों को समाज में काफी आलोचना सहन करनी पड़ती है। शायद इस प्रकार की सीख मनुष्य के मन में यह रोग पैदा करने लगती है और उनके अंदर काबिलियत होने के बावजूद इस डर से समाज में कुछ अलग कर दिखाने व अपने सपनों को जीने की हिम्मत नहीं आ पाती।
              दोस्तों! यदि ऐसे ही कुछ महान व्यक्ति जो समाज में हम सभी के लिए उदाहरण हैं, विश्व में प्रख्यात हैं, को तभी रोक दिया जाता जब कुछ अलग कर दिखाने की चाह उनमें उत्पन्न हुई थी। तो क्या भारतवर्ष को डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम जैसे महान व्यक्तित्व वाले वैज्ञानिक व राष्ट्रपति मिल पाते? अत्यंत संघर्ष वाला बालपन व्यतीत करने के पश्चात भी उनमें कुछ अलग कर गुजरने का जो जज्बा था उसे पूरी दुनिया ने देखा और उनका जीवन सभी के समक्ष एक बेहतरीन उदाहरण बन गया। यदि वह समाज के डर से अपने सपनों को उड़ने से रोक लेते तो क्या समाज को 'सपनों की उड़ान का महत्व' कभी समझ आता? ('सपनों की उड़ान' डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम द्वारा लिखी गई किताब)। वहीं दूसरी ओर आज के महान क्रिकेटर एम. एस. धोनी की बात करें जिनके संघर्ष को उनके जीवन पर आधारित फिल्म में सभी ने देखा है। वह अपने स्कूल में फुटबॉल खेला करते थे। उनके खेल से प्रभावित होकर उन्हें स्कूल की क्रिकेट टीम में विकेटकीपर बना दिया गया। अपने खेल में अच्छे प्रदर्शन के कारण उन्हें रेलवे में टी. सी. की सरकारी नौकरी भी मिली। किंतु उनके सिर पर क्रिकेट की दुनिया में कुछ कर दिखाने का जज्बा था। परिस्थितियों के विपरीत जाकर और लोग क्या कहेंगे इस की चिंता किए बिना उन्होंने अपने सपने को सच करने के लिए पूरी मेहनत की और उनके इसी जज्बे के कारण वे भारतीय क्रिकेट टीम के सफल कप्तान के रूप में उभर कर आए। अपनी मेहनत और लगन से क्रिकेट जगत में भारत को वर्ल्ड कप जिताकर विश्व की नंबर वन क्रिकेट टीम बनाया। यदि उस वक्त समाज में लोग क्या कहेंगें?? यह सोच कर या फिर उनके प्रयासों पर लोगों द्वारा की जाने वाली आलोचनाओं से डर कर यदि वह अपने कदम अपने सपनों की ओर नहीं बढ़ाते तो क्रिकेट में उन जैसे व्यक्तित्व वाले कप्तान और भारत को क्रिकेट के शिखर तक पहुंचाने वाले यह महान खिलाड़ी क्या कभी हमें मिल पाते?
            यदि मनुष्य दूसरों की सोच को खुद पर हावी होने देगा तो वह यह कभी नहीं सोच पाएगा कि उसे जीवन में अपना क्या लक्ष्य निर्धारित करना है। बचपन से लेकर बुढ़ापे तक लोग बस यह सोच कर कुछ अलग नहीं कर पाते हैं और अपने सपनों को नहीं जी पाते हैं  कि लोग क्या कहेंगे। पर जब हम दूसरों को उनकी अलग सोच, संघर्ष व समाज में सम्मान देख उस वक्त यह सोचते हैं कि यदि मैं भी बिना डरे सबसे लड़ अपने सपनों को पूरा करने की ठान लेता तो आज पता नहीं किस शिखर पर होता। ऐसे व्यक्तियों को पछतावे के अलावा अंत में कुछ हासिल नहीं होता है। मनुष्य को हमेशा पक्षियों की तरह अपने पंख फैलाकर अपने सपनों के आसमान में बिना किसी विपरीत परिस्थितियों की परवाह किए बिना उड़ते रहना चाहिए। यदि उड़ना बंद कर देंगे तो कभी चल भी नहीं पाएंगे। प्रयत्न करते हुए और समाज की आलोचनाओं से बिना डरे मनुष्य को अपनी मंजिल की ओर आगे बढ़ते रहना चाहिए और यदि वह अपनी मंजिल हासिल कर लेता हैं तो यही समाज वाहवाही भी उसी तरह करता है जिस प्रकार आलोचना किया करता था। जो लोग आपकी बुराई करते नहीं थकते थे, वही लोग आप के जीवन से प्रेरणा लेंगे और दूसरों को भी देंगे।
 सच ही है ना??? 
कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।
पर आलोचनाओं से डर कर आप मत बदलना,
आपका व्यक्तित्व ही है आपका गहना, 
मंजिल ज़रूर मिलेगी बस जैसे हो वैसे ही रहना।

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